
बिना नीलामी तोड़े गए शासकीय भवन!
सरकारी भवनों पर चला बुलडोजर, नियम-कायदों को भी किया ध्वस्त!
संवाददाता धनंजय जोशी
जिला पांढुरना मध्य प्रदेश
नगर पालिका परिषद पांढुरना एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। शासकीय भवनों के ध्वस्तीकरण (डिस्मेंटल) कार्य में नियमों की खुली अनदेखी, बिना नीलामी सरकारी संपत्ति हटाने और लाखों रुपये के संभावित राजस्व नुकसान के आरोपों ने पूरे मामले को राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बना दिया है।
जानकारी के मुताबिक मुख्य नगर पालिका अधिकारी के शासकीय बंगले, साइंस कॉलेज के पुराने भवन तथा फायर स्टेशन भवन को तोड़ने की स्वीकृति परिषद बैठक में दी गई थी, लेकिन इसके बाद न तो नियमानुसार टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई और न ही सार्वजनिक नीलामी कराई गई। आरोप है कि अधिकारियों ने सीधे तौर पर भवनों को तोड़ने का काम शुरू करा दिया, जिससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

मामला तब और गरमा गया जब जयंत घोड़े, सुरेश सुरजुसे सहित अन्य पार्षदों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की। उनका आरोप है कि डिस्मेंटल कार्य में नियमों की अनदेखी कर नगर पालिका को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया।
विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि भवनों में मौजूद लोहे की सलाखें, सागौन की लकड़ी, दरवाजे, खिड़कियां और अन्य उपयोगी सामग्री का न तो मूल्यांकन कराया गया और न ही उनकी सार्वजनिक नीलामी की गई। सूत्रों के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया में नगर पालिका परिषद को करीब 10 लाख रुपये या उससे अधिक के राजस्व नुकसान की आशंका है।
आरोप यह भी हैं कि मामले को दबाने के लिए नगर पालिका परिषद द्वारा एक तथाकथित “निगरानी समिति” बना दी गई, जबकि जानकारों का कहना है कि नगर पालिका अधिनियम में ऐसी किसी समिति का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इससे पूरी कार्रवाई की वैधानिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

रानी दुर्गावती वार्ड से भाजपा पार्षद यादवराव ढोबले ने भी मामले को बेहद संदेहास्पद बताते हुए आरोप लगाया कि डिस्मेंटल कार्य शुरू होने से पहले ही अधिकारी के क्वार्टर से मूल्यवान सामग्री हटाई गई। उन्होंने इसे शासकीय संपत्ति के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार का गंभीर मामला बताते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
वहीं नगर कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष जयंत घोड़े ने मांग की है कि भवनों से हटाई गई सामग्री का भौतिक सत्यापन, सूचीकरण और स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाए। साथ ही दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर वैधानिक कार्रवाई कर नगर पालिका को हुई संभावित राजस्व हानि की भरपाई जिम्मेदार लोगों से कराई जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है —
जब शासकीय भवनों के डिस्मेंटल में न टेंडर हुआ, न नीलामी… तो आखिर लाखों रुपये की सरकारी संपत्ति गई कहां? और इस संभावित नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?